द्रौपदी-भीमसेनसंवादः
Draupadī–Bhīmasena Dialogue on Suffering, Kāla, and Daiva
भारत! कुन्तीकुमार! इनसे भी भारी दूसरे दुःख मुझपर आ पड़े हैं, उनका भी वर्णन करती हूँ, सुनो ।। युष्मासु प्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत । शोषयन्ति शरीरं मे कि नु दु:ः:खमत: परम्,तुम सबके जीते-जी नाना प्रकारके कष्ट मेरे शरीरको सुखा रहे हैं, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?
yūṣmāsu priyamāṇeṣu duḥkhāni vividhāny uta | śoṣayanti śarīraṃ me ki nu duḥkham ataḥ param ||
«Хотя вы — мои возлюбленные — ещё живы, многообразные скорби иссушают само моё тело. Какая печаль может быть больше этой?»
वैशम्पायन उवाच