Rathaghoṣa–Saṃjñāna: Damayantī’s Inference and the Dispatch of the Envoy (Āraṇyaka-parva, Adhyāya 71)
दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दुःखेन मोहिता । अस्मदर्थ भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान्,वे सोचने लगे--'“क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? अथवा सम्भव है, दुःखसे मोहित होकर वह ऐसा कार्य कर ले। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसने मेरी प्राप्तिके लिये यह महान् उपाय सोच निकाला हो?
Он размышлял: «Неужели Дамаянти могла сказать такое? Или, ослеплённая горем, она способна на подобный поступок? А может, ради того, чтобы вновь обрести меня, она и придумала этот великий замысел?»
बृहृदश्च उवाच