अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
सर्वथा धर्ममूलो<र्थों धर्मश्चार्थपरिग्रह: । इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा,“अर्थका कारण है धर्म और धर्म सिद्ध होता है अर्थसंग्रहसे। जैसे मेघसे समुद्रकी पुष्टि होती है और समुद्रसे मेघकी पूर्ति। इस प्रकार धर्म और अर्थको एक-दूसरेके आश्रित समझना चाहिये
Во всех отношениях артха коренится в дхарме, а дхарма утверждается стяжанием артхи. Знай: они взаимно поддерживают друг друга, как тучи и океан.
वैशम्पायन उवाच