Draupadī’s Rebuke of Jayadratha and Dhaumya’s Admonition (Āraṇyaka-parva, Adhyāya 252)
पित्र्यं राज्यं प्रयच्छैषां तत: सुखमवाप्स्यसि । मेरे इस प्रस्तावको समझकर ऐसा ही करो। इससे तुम कृतज्ञ माने जाओगे। पाण्डवोंके साथ उत्तम भाईचारेका बर्ताव करके उन्हें राज्यसिंहासनपर बिठा दो और उनका पैतृक राज्य उन्हें समर्पित कर दो। इससे तुम्हें सुख प्राप्त होगा
Верни им отцовское, наследственное царство — и тогда обретёшь счастье.
वैशम्पायन उवाच