दुर्योधनस्य प्रायोपवेशः — शकुनिसान्त्वनम् तथा कृत्याह्वानम्
Duryodhana’s Fast: Śakuni’s Consolation and the Summoning of a Kṛtyā
न हि द्वैतवने किंचिद् विद्यतेडन्यत् प्रयोजनम् । उत्सादनमृते तेषां वनस्थानां महाद्युते,“महातेजस्वी कर्ण। (पिताजीको यह समझते देर नहीं लगेगी कि) वनमें रहनेवाले पाण्डवोंको उखाड़ फेंकनेके अतिरिक्त हमलोगोंके द्वैतवनमें जानेका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है
«О Карна, исполненный великого сияния! В лесу Двайтаване нет иной цели — кроме как истребить тех Пандавов, что обитают в лесной глуши».
वैशम्पायन उवाच