Adhyāya 188: Mārkaṇḍeya’s Account of Yuga-Decline and the Restoration Motif
Kali-yuga to Kalki
उद्धृत्य गज़्ासलिलात् ततो मत्स्यं मनु: स्वयम् । समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत्,शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा--'प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गंगाजीमें हिल- डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर इतनी कृपा अवश्य कीजिये।' कुन्तीनन्दन! तब मनुने स्वयं उस मत्स्यको गंगाजीके जलसे निकालकर समुद्रतक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया
uddhṛtya gajā-salilāt tato matsyaṃ manuḥ svayam | samudram anayāt pārtha tatra cainam avāsṛjat śatrudamana ||
Маркандейя сказал: «Тогда Ману сам поднял рыбу из вод Ганги и, о Партха, отнёс её к океану; там он отпустил её, о укротитель врагов.»
मार्कण्डेय उवाच