Yugapramāṇa–Kaliyuga-lakṣaṇa–Pralaya-kathā
Markandeya’s Account of Yugas, Kali Signs, and Dissolution
द्वेष्टार: किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजा: | यथा मे गौतम: प्राह ततो न व्यवसाम्यहम्,परंतु एक बात विचारणीय है। वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है। इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा हूँ
«Но там есть ненавидящие нас — брахманы, живущие в том месте. Как сказал мне Гаутама, потому я и не решаюсь идти туда».
मार्कण्डेय उवाच