मान्धातृ-जन्म-चरितम्
The Birth and Career Account of Māndhātṛ
इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षि: पुत्रकारणात् । सम्भूृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान्,वे महामना राजर्षि महान् व्रतका पालन करनेवाले थे तो भी उनके कोई संतान नहीं हुई। तब वे मनस्वी नरेश राज्यका भार मन्त्रियोंपर रखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने- आपको परमात्म-चिन्तनमें लगाकर सदा वनमें ही रहने लगे। एक दिनकी बात है, राजा युवनाश्व उपवासके कारण दु:खित हो गये। प्याससे उनका हृदय सूखने लगा। उन्होंने जल पीनेकी इच्छासे रातके समय महर्षि भूगुके आश्रममें प्रवेश किया। राजेन्द्र! उसी रातमें महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवनने सुद्युम्नकुमार युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये एक इष्टि की थी। उस इष्टिके समय महर्षिने मन्त्रपूत जलसे एक बहुत बड़े कलशको भरकर रख दिया था
lomaśa uvāca | iṣṭiṁ cakāra saudyumner maharṣiḥ putrakāraṇāt | sambhṛto mantrapūtena vāriṇā kalaśo mahān |
Ломаша сказал: Ради обретения сына для линии Саудьюмны великий риши совершил ишти (ведический жертвенный обряд). В этом обряде был наполнен и отставлен большой сосуд с водой, очищенной священными мантрами. Эпизод показывает, что продолжение рода — не простое желание, но забота дхармы, решаемая предписанной ритуальной дисциплиной и духовными средствами.
लोमश उवाच