Cyavana’s Tapas, Sukanyā’s Curiosity, and Śaryāti’s Appeasement (च्यवन-सुकन्या-उपाख्यान आरम्भ)
पर्यपृच्छत् सुद्ृद्वर्ग पर्यजानन्न चैव ते । आनाहार्त ततो दृष्टवा तत्सैन्यमसुखार्दितम्,“आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।” तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा--“तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।” यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की--
paryapṛcchat sudṛḍhavargaḥ paryajānann caiva te | ānāhārāt tato dṛṣṭvā tat-sainyam asukhārditam ||
Царь снова и снова расспрашивал свой верный круг союзников и приближённых, но и они не смогли выяснить причину. Затем, увидев, что всё войско изнемогает в бедствии — не в силах принимать пищу и терзаемое телесной мукой, — он ещё острее ощутил тяжесть долга: правитель обязан доискаться истины бедствия и облегчить страдания тех, кто находится под его защитой.
लोगश उवाच