Āraṇyaka-parva, Adhyāya 1 — The Pandavas’ Exit from Gajasāhvaya and the Citizens’ Lament (जनमेजयप्रश्नः; पाण्डवानां वनप्रस्थानम्)
वैशम्पायन उवाच तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ता: प्रजा: । चक्कुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति संहता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजके द्वारा इस प्रकार विनयपूर्वक अनुरोध किये जानेपर उन समस्त प्रजाओंने “हा! महाराज!” ऐसा कहकर एक ही साथ भयंकर आर्तनाद किया
Вайшампаяна сказал: «О Джанамеджая! Когда Дхармараджа так смиренно обратился к ним с просьбой, все те подданные, собравшись вместе, разом издали страшный, скорбный вопль: “О, государь!”»
वैशम्पायन उवाच