Udyoga Parva Adhyāya 92: Kṛṣṇasya sabhāpraveśaḥ
Krishna’s Entry into the Royal Assembly
मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नातिरोचयन् । न प्राप्नोति फलं तस्येत्येवं धर्मविदो विदु:ः ७ ।। इसी प्रकार यदि मनुष्य मनसे पापका चिन्तन करते हुए भी उसमें रुचि न होनेके कारण उसे क्रियाद्वारा सम्पादित न करे, तो उसे उस पापका फल नहीं मिलता है। ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं
Так же, если человек в уме помышляет о грехе, но, не находя в нём услады, не совершает его делом, то не получает плода этого греха — так знают ведающие дхарму.
(वैशग्पायन उवाच