Udyoga-parva Adhyāya 28: Dharmādharmalakṣaṇa in Āpad
Crisis-Discernment of Right and Wrong
यदा गृध्येत् परभूतौ नृशंसो विधिप्रकोपाद् बलमाददान: । ततो राज्ञामभवद् युद्धमेतत् तत्र जात॑ वर्म शस्त्र धनुश्च,जब कोई क्रूर मनुष्य दूसरेकी धन-सम्पत्तिमें लालच रखकर उसे ले लेनेकी इच्छा करता है और विधाताके कोपसे (परपीडनके लिये) सेना-संग्रह करने लगता है, उस समय राजाओंमें युद्धका अवसर उपस्थित होता है। इस युद्धके लिये ही कवच, अस्त्र-शस्त्र और धनुषका आविष्कार हुआ है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि कृष्णवाक्ये एकोनत्रिंशो 5ध्याय:
yadā gṛdhyet parabhūtau nṛśaṁso vidhiprakopād balam ādadānaḥ | tato rājñām abhavad yuddham etat tatra jātaṁ varma śastra dhanuś ca ||
Когда безжалостный человек возжаждет чужого богатства и, гонимый гневом судьбы, начнёт собирать силу, чтобы притеснять, тогда среди царей возникает повод к войне. Ради этой самой войны и появились доспех, оружие и лук — орудия, рождённые из распри и из алчности, что её разжигает.
वायुदेव उवाच