अध्याय १२२ — कृष्णस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः
Kṛṣṇa’s Ethical Counsel to Duryodhana
चतुष्पादस्त्वया धर्मश्चितो लोक्येन कर्मणा । अक्षयस्तव लोको<यं कीर्तिश्रिवाक्षया दिवि,“राजन! तुमने लोकहितकारी सत्कर्मद्वारा चारों चरणोंसे युक्त धर्मका संग्रह किया; अतः तुम्हें यह अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त हुआ और स्वर्गमें तुम्हारी क्षीण न होनेवाली कीर्ति फैल गयी
«О царь! Благими деяниями, полезными миру, ты собрал дхарму, стоящую на всех четырёх опорах; потому и обрёл ты этот неистощимый небесный удел, и в вышних мирах распространилась твоя неувядающая слава и сияние.»
नारद उवाच