अरण्यवृत्ति-वैराग्योपदेशः | Forest Discipline and the Program of Non-Attachment
एककालं चरन् भैक्ष्यं त्रीनथ द्वे च पज्च वा | स्नेहपाशं विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम्,जब घरोंमेंसे धुआँ निकलना बंद हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो, घरके सब लोग खा-पी चुके हों, परोसी हुई थालीको इधर-उधर ले जानेका काम समाप्त हो गया हो और भिखमंगे भिक्षा लेकर लौट गये हों, ऐसे समयमें मैं एक ही वक्त भिक्षाके लिये दो, तीन या पाँच घरोंतक जाया करूँगा। सब ओरसे स्नेहका बन्धन तोड़कर इस पृथ्वीपर विचरता रहूँगा
ekakālaṃ caran bhaikṣyaṃ trīn atha dve ca pañca vā | snehapāśaṃ vimucyāhaṃ cariṣyāmi mahīm imām ||
Юдхиштхира сказал: «Живя подаянием, которое беру лишь раз в день, я буду просить милостыню только в двух, трёх или, самое большее, в пяти домах. Отринув узы привязанности, я буду странствовать по этой земле».
युधिछिर उवाच