भीष्मदर्शनार्थं प्रस्थानम्
Departure to Behold Bhīṣma
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वनें युधिष्ठिर आदिका आगमनविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५२ ॥। ऑपन-आ क्र बछ। 2 त्रिपञज्चाशत्तमो<ड्ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्वचर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना वैशम्पायन उवाच तत:ः शयनमाविश्य प्रसुप्तो मधुसूदन: । याममात्रार्थशेषायां यामिन्यां प्रत्यबुद्धयत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण एक सुन्दर शय्याका आश्रय लेकर सो गये। जब आधा पहर रात बीतनेको बाकी रह गयी, तब वे जागकर उठ बैठे
vaiśampāyana uvāca | tataḥ śayanam āviśya prasupto madhusūdanaḥ | yāmamātrārthaśeṣāyāṃ yāminyāṃ pratyabuddhyata ||
Вайшампаяна сказал: Затем Мадхусудана (Шри Кришна) лёг на своё ложе и уснул. Когда до конца ночи оставалась лишь одна стража, он вновь пробудился.
वैशम्पायन उवाच