न मे मनो रज्यति भोगकाले दृष्टवा यतीन् प्रार्थयतः परत्र । तेनातिथे बुद्धिबलाश्रयेण धर्मेण धर्मे विनियुद्धक्ष्व मां त्वम्,जब मैं सुनता हूँ कि संसारमें विषयोंके सम्पर्कमें आये हुए साक्चिक पुरुष भी तरह तरहकी यातनाएँ भोगते हैं तथा जब देखता हूँ कि समस्त प्रजाके ऊपर यमराजकी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, तब भोगकालमें भोगोंके प्राप्त होनेपर भी उन्हें भोगनेकी रुचि मेरे मनमें नहीं होती है। जब संन्यासियोंको भी दूसरोंके दरवाजोंपर अन्न-वस्त्रकी भीख माँगते देखता हूँ, तब उस संन्यास-धर्ममें भी मेरा मन नहीं लगता है; अतः अतिथिदेव! आप अपनी ही बुद्धिके बलसे अब मुझे धर्मद्वारा धर्ममें लगाइये
na me mano rajyati bhogakāle dṛṣṭvā yatīn prārthayataḥ paratra | tenātithe buddhibalāśrayeṇa dharmeṇa dharme viniyuddhakṣva māṃ tvam ||
Брахман сказал: «Мой ум не находит радости в наслаждениях, даже когда приходит время удовольствий, ибо я вижу аскетов (яти), ищущих “по ту сторону” — в мире ином, — и всё же вынужденных просить подаяние. Потому, о гость, опираясь на силу твоего разумения, наставь меня дхармой и утверди меня прочно в дхарме».
ब्राह्मण उवाच