तपःस्वाध्यायनिरत: सत्य: सज्जनसम्मत: । न्यायप्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वित:,भीष्मजी कहते हैं--नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! (नारदजीने जो कथा सुनायी, वह इस प्रकार है --) गंगाके दक्षिणतटपर महापद्म नामक कोई श्रेष्ठ नगर है। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह एकाग्रचित्त और सौम्य स्वभावका मनुष्य था। उसका जन्म चन्द्रमाके कुलमें-- अत्रिगोत्रमें हुआ था। वेदमें उसकी अच्छी गति थी और उसके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था। वह सदा धर्मपरायण, क्रोधरहित, नित्य संतुष्ट, जितेन्द्रिय, तप और स्वाध्यायमें संलग्न, सत्यवादी और सत्पुरुषोंके सम्मानका पात्र था। न्यायोपार्जित धन और अपने ब्राह्मणोचित शीलसे सम्पन्न था
tapaḥsvādhyāyanirataḥ satyaḥ sajjanasammataḥ | nyāyaprāptena vittena svena śīlena cānvitaḥ ||
Бхишма сказал: «Он был предан аскезе и самоизучению, правдив и одобряем добродетельными. Он обладал богатством, добытым справедливыми средствами, и был украшен собственным благородным поведением.»
भीष्म उवाच