Atithi’s Direction to the Nāga-sage Padma at Naimiṣa (अतिथ्युपदेशः—नैमिषे पद्मनागोपाख्यानप्रस्तावः)
- प्रीति, प्रकाश, उत्कर्ष, हलकापन, सुख, कृपणताका अभाव, रोषका अभाव, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धृति, अहिंसा, शौच, अक्रोध, सरलता, समता, सत्य तथा दोषदृष्टिका अभाव--ये सत्त्वके अठारह गुण हैं। - “विच्छ गतौ” (तुदादि), 'विच्छ दीप्तौ' (चुरादि), “विषु सेचने' (भ्वादि), “विष्लू व्याप्तौ' (जुहोत्यादि), “विश प्रवेशने' (तुदादि), “ष्णु प्रख्वणे' (अदादि)--इन सभी धातुओंसे “विष्णु” शब्दकी सिद्धि होती है, अत: गति, दीप्ति, सेचन, व्याप्ति, प्रवेश तथा प्रख्रवण--ये सभी अर्थ “विष्णु” शब्दमें निहित हैं। द्विचत्वारिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवतन्नामोंके हेतु तथा रुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय अजुन उवाच अग्नीषोमौ कथं पूर्वमेकयोनी प्रवर्तितौ । एष मे संशयो जातस्तं छिन्धि मधुसूदन,अर्जुनने पूछा--मधुसूदन! अग्नि और सोम पूर्वकालमें एकयोनि कैसे हो गये? मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हुआ है। आप इसका निवारण कीजिये
arjuna uvāca | agnīṣomau kathaṃ pūrvam ekayonī pravartitau | eṣa me saṃśayo jātas taṃ chindhi madhusūdana ||
Арджуна сказал: «Мадхусудана, как в древние времена Агни и Сома смогли произойти из одного источника (как бы из одного лона)? Это сомнение возникло в моём уме — прошу, рассей его».
अजुन उवाच