Akṣara–Kṣara Viveka: Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda (अक्षर-क्षर विवेकः)
विरक्तं शोध्यते वस्त्र न तु कृष्णोपसंहितम् । प्रयत्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निबोध मे,नरेन्द्र! बिना रँगा हुआ वस्त्र धोनेसे स्वच्छ हो जाता है; किंतु जो काले रंगमें रँगा हो वह प्रयत्न करनेसे भी सफेद नहीं होता, पापको भी ऐसा ही समझो। उसका रंग भी जल्दी नहीं उतरता है
О владыка людей! Одежда, не окрашенная, от стирки становится чистой; но та, что выкрашена в чёрное, и при усилии не делается белой. Так и грех следует разуметь: его окраска не сходит скоро.
पराशर उवाच