Śoka-śamana: Kṛṣṇa’s Consolation and Nārada’s Exempla to Sṛñjaya
Chapter 29
न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे दृष्टवैवाहं नारद त्वां विशोक: | शुश्रूषे ते वचन ब्रह्मवादिन् न ते तृप्याम्यमृतस्थेव पानात्,महर्षि नारद! आपने जो कुछ कहा है, आपका यह उपदेश व्यर्थ नहीं गया है। आपका दर्शन करके ही मैं शोकरहित हो गया हूँ। ब्रह्मवादी मुने! मैं आपका यह प्रवचन सुनना चाहता हूँ और अमृतपानके समान उससे तृप्त नहीं हो रहा हूँ
na te moghaṃ vipralaptaṃ maharṣe dṛṣṭa-vaivāhaṃ nārada tvāṃ viśokaḥ | śuśrūṣe te vacanaṃ brahma-vādin na te tṛpyāmy amṛtasyeva pānāt, maharṣi nārada ||
Йринджая сказал: «О великий риши Нарада, твои слова не были сказаны напрасно. От одного лишь твоего явления я стал свободен от скорби. О провозвестник Брахмана, я желаю слушать твою речь; как пьющий нектар, я не могу ею насытиться».
यृंजय उवाच