परिव्राजक-आचारः (Conduct of the Wandering Renunciant) — Mahābhārata, Śānti-parva 269
अनश्रिता: पापकर्म कदाचित् कर्मयोगिन: । मन: संकल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चया:,जो प्राप्त हुए पदार्थोका त्याग सब प्रकारके लालचको छोड़कर करते हैं, जो कृपणता और असूयासे रहित हैं और “धनके उपयोगका यही सर्वोत्तम मार्ग है” ऐसा समझकर सत्पात्रोंको दान करते हैं, कभी पापकर्मका आश्रय नहीं लेते तथा सदा कर्मयोगके साधनमें ही लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्पकी सिद्धि होने लगती है और उन्हें विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परब्रह्मके विषयमें दृढ़ निश्चय हो जाता है
anāśritāḥ pāpakarma kadācit karmayoginaḥ | manaḥ-saṅkalpa-saṁsiddhā viśuddha-jñāna-niścayāḥ ||
Капила сказал: Карма-йогины никогда не прибегают к греховному действию. По мере того как решимость ума их последовательно исполняется и совершенствуется, они обретают твёрдую уверенность в чистом знании—ясность относительно высшей реальности—через жизнь, основанную на дисциплине действия и нравственном самообуздании.
कपिल उवाच