सूक्ष्मभूत-भूतात्मविज्ञानम्
Knowing the subtle principle and the bhūtātman through yoga
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २४४ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल ३१३ “लोक हैं) शीश (0) आल आन+- > ७ प्राणाय स्वाहा, * अपानाय स्वाहा, ७ व्यानाय स्वाहा, * समानाय स्वाहा, $ उदानाय स्वाहा--ये प्राणाग्निहोत्रके पाँच मन्त्र हैं, भोजन आरम्भ करते समय पहले आचमन करके इनमेंसे एक-एक मन्त्रको पढ़कर एक-एक ग्रास अन्न मुँहमें डाले। इस प्रकार पाँच ग्रास पूरे होनेपर पुन: आचमन कर ले। यही प्राणाग्निहोत्र कहलाता है। पज्चचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा शुक उवाच वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा । योक्तव्यो55त्मा कथं शक्त्या वेद्यं वै काड्क्षता परम्,शुकदेवजीने पूछा--पिताजी! ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंमें जैसे शास्त्रोक्त नियमके अनुसार चलना आवश्यक है, उसी प्रकार इस वानप्रस्थ आश्रममें भी शास्त्रोक्त नियमका पालन करते हुए चलना चाहिये। यह सब तो मैंने सुन लिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ, जो जानने योग्य परब्रह्म परमात्माको पाना चाहता हो, उसे अपनी शक्तिके अनुसार उस परमात्माका चिन्तन कैसे करना चाहिये?
śuka uvāca | vartamānas tathaivātra vānaprasthāśrame yathā | yoktavyo 'tmā kathaṃ śaktyā vedyaṃ vai kāṅkṣatā param ||
Шука сказал: «Отец, я слышал, как следует жить по предписанию шастр в стадиях брахмачарьи и домохозяина; так же и в этой стадии ванапрастхи надлежит идти, соблюдая шастрическую дисциплину. Теперь же я хочу знать: тот, кто жаждет познать высшую Реальность, то, что должно быть познано, — как ему, по мере своих сил, обратиться внутрь, как созерцать и обуздывать себя, чтобы достичь Высшего?»
शुक उवाच