महाभूत–इन्द्रिय–मनस्–बुद्धि–अन्तरात्मा विवेकः | Discrimination of Elements, Senses, Mind, Intellect, and Inner Self
आत्मज्ञानी पुरुष सुशील, सदाचारी और पापरहित होता है। वह इहलोक और परलोकके लिये भी कोई कर्म करना नहीं चाहता। क्रोध, मोह, संधि और विग्रहका त्याग करके वह सब ओरसे उदासीन-सा रहता है ।। यमेषु चैवानुगतेषु न व्यथे स्वशास्त्रसूत्राहुतिमन्त्रविक्रम: । भवेद् यथेष्टागतिरात्मवेदिनि न संशयो धर्मपरे जितेन्द्रिये,जो अहिंसा आदि यमों और शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करनेमें कभी कष्टका अनुभव नहीं करता, संन्यास-आश्रमका विधान करनेवाले शास्त्रके सूत्रभूत वचनोंके अनुसार त्यागमयी अग्निमें अपने सर्वस्वकी आहुति दे देनेके लिये निरन्तर उत्साह दिखाता है, उसे इच्छानुसार गति [मुक्ति) प्राप्त होती है। ऐसे जितेन्द्रिय एवं धर्मपरायण आत्मज्ञानीकी मुक्तिके विषयमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है
yameṣu caivānugateṣu na vyathe svaśāstrasūtrāhutimantravikramaḥ | bhaved yatheṣṭagatirātmavedini na saṁśayo dharmapare jitendriye ||
Вьяса сказал: Тот, кто следует ямам (обузданиям), не испытывает тяготы в их соблюдении; и, укреплённый мантрами и руководящими сутрами своего шастры, он неизменно ревностен в том, чтобы принести всё своё существо в жертву — как подношение — в огонь отречения. Для такого знающего Атман — обуздавшего чувства и преданного дхарме — нет сомнения, что он достигает искомого пути, вплоть до освобождения.
व्यास उवाच