भिक्षुलक्षणम्—एकचर्याः, अहिंसा, कैवल्याश्रमः
Marks of the Mendicant: Solitary Wandering, Non-Injury, and the Kaivalya-Discipline
#दघ>2८5-> (9) बीज - ध्यानयोगके साधकको ऐसे स्थानपर आसन लगाना चाहिये, जो समतल और पवित्र हो। निर्जन वन, गुफा या ऐसा ही कोई एकान्त स्थान ही ध्यानके लिये उपयोगी होता है। ऐसे स्थानपर आसन लगानेको देशयोग कहते हैं। आहार-विहार, चेष्टा, सोना और जागना--ये सब परिमित और नियमानुकूल होने चाहिये। यही कर्मनामक योग है। परमात्मा एवं उसकी प्राप्तिके साधनोंमें तीव्र अनुराग रखना अनुरागयोग कहलाता है। केवल आवश्यक सामग्रीको ही रखना अर्थयोग है। ध्यानोपयोगी आसनसे बैठना उपाययोग है। संसारके विषयों और सगे-सम्बन्धियोंसे आसक्ति तथा ममता हटा लेनेको अपाययोग कहते हैं। गुरु और वेदशास्त्रके वचनोंपर विश्वास रखनेका नाम निश्चययोग है। चक्षुको नासिकाके अग्रभागपर स्थिर करना चक्षुर्योग है। शुद्ध और सात्त्विक भोजनका नाम है आहारयोग। विषयोंकी ओर होनेवाली मन- इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोकना संहारयोग कहलाता है। मनको संकल्प-विकल्पसे रहित करके एकाग्र करना मनोयोग है। जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि होनेके समय महान् दुःख और दोषोंका वैराग्यपूर्वक दर्शन करना दर्शनयोग है। जिसे योगके द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी हो, उसे इन बारह योगोंका अवश्य अवलम्बन करना चाहिये। > पातज्जलयोगदर्शनमें “देशबन्धश्षित्तस्य धारणा” अर्थात् एकदेशमें चित्तको एकाग्र करना धारणा बतलाया गया है। साधक सर्वप्रथम पृथ्वीतत्त्वमें चित्तको लगावे। इस धारणासे उसका पृथ्वीतत्त्वपर अधिकार हो जाता है। फिर पृथ्वीतत्त्वको जलतत्त्वमें विलीन करके जलतत्त्वकी धारणा करे। इससे साधक जलतत्त्वका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है। फिर जलतत्त्वको अग्नितत्त्वमें विलीन करके अग्नितत्त्वकी धारणा करे। इससे अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जाता है। तदनन्तर अग्निको वायुमें विलीन करके चित्तको वायुतत्त्वमें एकाग्र करे। इससे साधक वायुतत्त्वपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार क्रमश: वायुको आकाशमें और आकाशको मनमें तथा मनको बुद्धिमें लय करके उस-उस तत्त्वकी धारणा करे। इस प्रकार धारणाके ये सात स्तर हैं। अन्तमें बुद्धिको अव्यक्त ब्रह्ममें विलीन कर देना चाहिये। - सांख्य-कारिकामें बतलाया है-- मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतयः सप्त | षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुष: ।। (सां० का० ३) मूल प्रकृति--अव्याकृत माया, महत्तत्त्व आदि प्रकृतिके सात विकार--महत्तत्त्व, अहंकार और पज्चतम्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), सोलह विकार--पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्ू, हाथ, पैर, गुदा और शिक्ष) तथा मन और पजञ्चमहाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) एवं पुरुष, जो न प्रकृति है और न प्रकृतिका विकार ही--इस प्रकार सांख्यके अनुसार ये पचीस तत्त्व हैं। पातञ्जलयोगदर्शनमें इनका इस प्रकार उल्लेख मिलता है-- विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि | (योग० साधनपाद १९) “विशेष--पञ्चमहाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन, अविशेष-- पञ्चतन्मात्रा और अहंकार, लिंगमात्र--महत्तत्त्व, अलिंग--मूलप्रकृति; इस प्रकार ये चौबीस तत्त्व एवं पचीसवाँ द्रष्टा (पुरुष) है। सप्तत्रिशदधिकद्धिशततमो< ध्याय: सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठठाके तारतम्यका वर्णन व्यास उवाच अथ ज्ञानप्लवं धीरो गृहीत्वा शान्तिमात्मन: । उन्मज्जंश्व निमज्जंश्व ज्ञानमेवाभिसंश्रयेत्,व्यासजी कहते हैं--वत्स! धीर पुरुषको चाहिये कि वह विवेकरूप नौकाका अवलम्बन लेकर भव-सागरमें डूबता-उतराता हुआ अर्थात् प्रत्येक परिस्थितिमें अपनी परम शान्तिके लिये वास्तविक ज्ञानके आश्रित हो जाय
vyāsa uvāca | atha jñānaplavaṁ dhīro gṛhītvā śāntim ātmanaḥ | unmajjaṁś ca nimajjaṁś ca jñānam evābhisaṁśrayet ||
Вьяса сказал: Тогда стойкий человек, ухватившись за плот истинного знания ради собственного внутреннего мира, должен опираться лишь на знание — будь он то всплывающим, то тонущим среди волн мирского опыта.
व्यास उवाच
One should treat liberating knowledge (jñāna) as the sole refuge for attaining inner peace, remaining steady through both uplift and decline in worldly conditions—like holding a raft while crossing a turbulent ocean.
In the Śānti Parva’s instructional discourse, Vyāsa continues a didactic passage: he urges the listener to navigate saṁsāra’s fluctuations by grasping the ‘raft of knowledge’ and relying on discernment rather than external circumstances.