कालनिर्णयः, युगधर्मवर्णनम्, सृष्टिक्रमश्च
Time-Reckoning, Yuga-Dharma, and the Sequence of Creation
इन्द्र बोले--दैत्ययाज बलि! पहले जो तुम सहस्रों वाहनों और भाई-बन्धुओंसे घिरकर सम्पूर्ण लोकोंको संताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे और अब बन्धु-बान्धवों तथा मित्रोंसे परित्यक्त होकर जो अपनी यह अत्यन्त दीनदशा देख रहे हो, इससे तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं? ।। प्रीति प्राप्पातुलां पूर्व लोकांश्चात्मवशे स्थितान् । विनिपातमिमं बाहां शोचस्याहो न शोचसि,पूर्वकालमें तुमने सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर लिया था और अनुपम प्रसन्नता प्राप्त की थी; किंतु इस समय बाह्य जगतमें तुम्हारा यह घोर पतन हुआ है, यह सब सोचकर तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं?
śakra uvāca— prītiṁ prāptātulāṁ pūrvaṁ lokāṁś cātmavaśe sthitān | vinipātam imaṁ bāle śocasy aho na śocasi ||
Шакра (Индра) сказал: «О Бали, простодушный, прежде ты вкусил несравненную радость и держал все миры под своей властью. Но ныне ты пал в это разорение, оставленный родичами и друзьями. Видя такой переворот, скорбишь ли ты — или вовсе не скорбишь?»
श॒क्र उवाच