Gṛdhra–Jambuka Saṃvāda (Dialogue of the Vulture and the Jackal) — On Grief, Kāla, and Resolve
अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत् । 'प्राणनाथ! पहले मैं जिस प्रकार आपके साथ आनन्दपूर्वक रमण करती थी, अब उन सब सुखोंमेंसे कुछ भी मेरे लिये शेष नहीं रह गया है। पिता, भ्राता और पुत्र--ये सब लोग नारीको परिमित सुख देते हैं, केवल पति ही उसे अपरिमित या असीम सुख प्रदान करता है। ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी? ।। नास्ति भर्तसमो नाथो नास्ति भर्त्समं सुखम्
amitasya hi dātāraṁ bhartāraṁ kā na pūjayet | nāsti bhartṛsamo nātho nāsti bhartṛsamaṁ sukham ||
Бхишма сказал: «Кто не почтит мужа — неиссякаемого дарителя и кормильца? Нет защитника равного мужу, и нет счастья равного тому, что приходит через мужа».
भीष्म उवाच