Janamejaya’s Appeal for Pacification and Śaunaka’s Counsel on Humility (जनमेजय-शौनक संवादः)
तद् ब्रवीतु भवान् क्षिप्रं कि करोमि किमिच्छसि । प्रणयेन ब्रवीमि त्वां त्वं हि न: शरणागत:,“अत: शीघ्र बताइये, आप क्या चाहते हैं? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़े प्रेमसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप हमारे घर पधारे हैं
tad bravītu bhavān kṣipraṁ ki karomi kim icchasi | praṇayena bravīmi tvāṁ tvaṁ hi naḥ śaraṇāgataḥ ||
Бхишма сказал: «Тогда скажи скорее, господин: что мне сделать, чего ты желаешь? Я спрашиваю тебя с любовью, ибо ты пришёл в наш дом, ища прибежища».
भीष्म उवाच