Śaraṇāgatapālana—Prastāvanā
Protection of the Refuge-Seeker: Opening of the Kapota Narrative
अपन क्ाता बछ। 5 चत्वारिशदाधिकशततमो< ध्याय: भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश युधिछ्िर उवाच युगक्षयात् परिक्षीणो धर्मे लोके च भारत । दस्युभि: पीड्यमाने च कथं स्थेयं पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! पितामह! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर-ये तीनों युग प्राय: समाप्त हो रहे हैं, इसलिये जगत्में धर्मका क्षय हो चला है। डाकू और लुटेरे इस धर्ममें और भी बाधा डाल रहे हैं; ऐसे समयमें किस तरह रहना चाहिये?
yudhiṣṭhira uvāca | yugakṣayāt parikṣīṇo dharme loke ca bhārata | dasyubhiḥ pīḍyamāne ca kathaṃ stheyaṃ pitāmaha ||
Юдхиштхира сказал: «О Бхарата, когда эпохи приближаются к своему исходу, дхарма в мире истощилась. И когда общество вдобавок терзают разбойники и грабители, как следует стоять твердо — как следует жить, о Дед-старец?»
युधिछ्िर उवाच