Adhyāya 115: On Restraint Under Verbal Provocation in the Assembly (सभायां आक्रोश-सहिष्णुता)
ऑपन--मा_जल छा असल चतुर्दशाधिकशततमो< ध्याय: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ युधिछिर उवाच विद्वान् मूर्खप्रगल्भेन मृदुतीक्ष्णेन भारत । आक्रुश्यमान: सदसि कथं कुर्यादरिंदम,युधिषछ्िरने पूछा--शत्रुदमन भारत! यदि कोई ढीठ मूर्ख मधुर या तीखे शब्दोंमें भरी सभाके बीच किसी दिद्वान् पुरुषकी निन्दा करने लगे, तो वह उसके साथ कैसा बर्ताव करे?
yudhiṣṭhira uvāca |
vidvān mūrkha-pragalbhena mṛdu-tīkṣṇena bhārata |
ākruśyamānaḥ sadasi kathaṃ kuryād ariṃdama ||
Юдхиштхира сказал: «О Бхарата, укротитель врагов,— если посреди собрания учёного мужа поносит дерзкий глупец, то ли сладкими речами, то ли суровыми словами, как ему следует себя вести?»
युधिछिर उवाच