Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Saṃvāda on Restraint and Rājānīti
Chapter 50
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं) ऑपन--माज बक। अि्--छऋायज पजञ्चाशत्तमो<्ध्याय: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दुःख और चिन्ताका कारण बताना जनमेजय उवाच कथं समभवद् द्ूतं भ्रातृणां तन्महात्ययम् | यत्र तद् व्यसन प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहै:,जनमेजयने पूछा--मुने! भाइयोंमें वह महाविनाशकारी द्यूत किस प्रकार आरम्भ हुआ; जिसमें मेरे पितामह पाण्डवोंको उस महान् संकटका सामना करना पड़ा?
Janamejaya uvāca
kathaṁ samabhavad dyūtaṁ bhrātṝṇāṁ tan-mahātyayam |
yatra tad vyasanaṁ prāptaṁ pāṇḍavair me pitāmahaiḥ ||
Джанамеджая сказал: «Как возникла среди братьев та игра в кости — великое бедствие? В том деле моих дедов, Пандавов, ввергли в тяжкое несчастье. Скажи мне, как всё началось».
जनमेजय उवाच