रौद्रमस्त्रं समाधाय क्षेप्तुकामं किरीटवान् | ततोअग्रसन्मही चक्र राधेयस्यथ तदा नूप,तब शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने अग्नि और सर्पविषके समान भयंकर लोहमय दिव्य बाणको अभिमन्त्रित करके उसमें रौद्रासत्रका आधान किया और उसे कर्णपर छोड़नेका विचार किया। नरेश्वर! इतनेहीमें पृथ्वीने राधापुत्र कर्णके पहियेको ग्रस लिया
sañjaya uvāca | raudram astraṃ samādhāya kṣeptukāmaṃ kirīṭavān | tato 'grasat mahī cakraṃ rādheyasya atha tadā ||
Санджая сказал: Призвав оружие Раудра, Арджуна, увенчанный диадемой, желая метнуть его, приготовился поразить Радхею (Карну). И в то же мгновение земля схватила и поглотила колесо колесницы Карны.
संजय उवाच