युधिष्ठिरस्य धनंजय-प्रति गर्हा
Yudhiṣṭhira’s Reproach to Dhanaṃjaya
तैर्युक्ते रथमास्थाय प्रायाद् राजा पराड्मुख: । उस समय दाँतोंके समान सफेद रंग और काली पूँछवाले जो घोड़े युधिष्ठिरकी सवारीमें थे, उन्हींसे जुते हुए दूसरे रथपर बैठकर राजा युधिष्ठिर रणभूमिसे विमुख हो शिविरकी ओर चल दिये || ४८ $ || एवं पार्थो5 भ्यपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथि:,जैसे जंगलमें सिंहसे पीड़ित हुआ हाथियोंका यूथ व्याकुल होकर भागता है, उसी प्रकार शत्रुओंद्वारा सब ओरसे रौंदी जाती हुई मनुष्यों और घोड़ोंसे परिपूर्ण आपकी विशाल सेना भाग चली। उसके रथ, हाथी और घोड़े तितर-बितर हो गये, आवरण और कवच नष्ट हो गये तथा अस्त्र-शस्त्र और धनुष छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर पड़े थे ।। इति श्रीमहा भारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनपठ्चाशत्तमो5ध्याय:
tair yukte ratham āsthāya prāyād rājā parāṅmukhaḥ |
Санджая сказал: Царь (Юдхиштхира), взойдя на колесницу, запряжённую теми же конями, отвернул лицо от поля брани и направился к стану. В этот миг явственно проступает нравственное бремя войны: даже праведный владыка, подавленный приливом сражения и распадом порядка, отступает — знак человеческой уязвимости и тяжкой этической цены братоубийственного раздора.
संजय उवाच