भीष्मपर्व — अध्याय 54: फल्गुन-प्रतिरोधः, सौबली-व्यूह-विध्वंसः, दुर्योधन-भीष्म-संवादः
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्न विशाम्पते | 'भरतश्रेष्ठ) तुम शोक न करो। इस प्रकार शोक करना तुम्हारेयोग्य नहीं है। तुम्हारे शूरवीर भाई सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात धनुर्धर हैं। राजन! मैं भी तुम्हारा प्रिय करनेवाला ही हूँ। नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी सात्यकि, विराट, ट्रुपद, ट्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न तथा सेनासहित ये सम्पूर्ण नरेश आपके कृपाप्रसादकी प्रतीक्षा करते हैं। महाराज! ये सब-के-सब आपके भक्त हैं | २६--२८ # || एष ते पार्षतो नित्यं हितकाम: प्रिये रत:
tvatprasādaṁ pratīkṣante tvadbhaktāś ca viśāṁpate |
Санджая сказал: «О владыка людей, они ожидают твоей милости; все они преданы тебе.»
संजय उवाच