Abhimanyu’s Assault on Bhīṣma’s Screen; Banner-Felling and Reinforcements (सौभद्र-भीष्म-समरः)
सम्बन्ध-- इस प्रकार श्रद्धापूर्वक किये हुए शास्त्र-विह्चित यज्ञ, तप; दान आदि कमोंका महत्त्व बतलाया गया; उसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि जो शास्त्रविद्वित यज्ञादि कर्म बिना श्रद्धाके किये जाते है; उनका क्या फल होता है: इसपर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हुए कहते हैं-- अश्रद्धया हुत॑ं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्ः । असदित्युच्यते पार्थ न च तत् प्रेत्य नो इह,हे अर्जुन! बिना श्रद्धाके किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है--वह समस्त “असत'--इस प्रकार कहा जाता है; इसलिये वह न तो इस लोकमें लाभदायक है और न मरनेके बाद ही?
aśraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛtaṁ ca yat | asad ity ucyate pārtha na ca tat pretya no iha ||
О Партха (Арджуна)! Всё, что приносится в жертву, даётся в дар или совершается как аскеза,—да и всякое доброе деяние,—если делается без веры, зовётся «асат», неистинным и бесплодным. Такое действие не приносит пользы ни здесь, в этой жизни, ни после смерти.
अजुन उवाच