अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे* और अपनेको अधोगतिमें न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।। बन्धुरात्मा55त्मनस्तस्थ येनात्मैवात्मना जित: । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्,जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है,* उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है? इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भधगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोडध्याय:
bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanas tu śatrutve vartetātmaiva śatru-vat ||
Для того, кто победил себя самим собой — покорив ум и чувства, — это самое «я» становится истинным союзником. Но для того, кто не овладел собой, то же «я» ведёт себя как враг, пребывая во враждебности, словно внешний противник.
अर्जुन उवाच