अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
सम्बन्ध-- इस प्रकार ध्यानयोगकी अन्तिम स्थितिको प्राप्त हुए पुरुषके और उसके जीते हुए वित्तके लक्षण बतला देनेके बाद अब तीन श्लोकोमें ध्यानयोगद्वारा सच्चिदानन्द परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं यत्रोपरमते चित्त निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मना$5त्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति,योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है? और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआः सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही संतुष्ट रहता है
arjuna uvāca | yatroparamate cittaṁ niruddhaṁ yogasevayā | yatra caivātmanātmānaṁ paśyann ātmani tuṣyati ||
В каком состоянии ум, обузданный постоянным служением йоге, приходит к совершенной тишине? И в каком состоянии человек, созерцая Атман Атманом, находит удовлетворение лишь в Атмане?
अर्जुन उवाच