Marutta–Indra Rivalry and Bṛhaspati’s Priestly Refusal (मरुत्तेन्द्रस्पर्धा—बृहस्पतेः पौरोहित्यनिश्चयः)
अविक्षिन्नाम शत्रुंजित् स वशे कृतवान् महीम् । विक्रमेण गुणैश्वैव पितेवासीत् स पार्थिव:,कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित् ययातिके समान धर्मज्ञ थे। उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओंपर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था। वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे
avikṣinnāma śatruñjit sa vaśe kṛtavān mahīm | vikrameṇa guṇaiś caiva pitevāsīt sa pārthivaḥ ||
Вьяса сказал: Авикшит — верный своему имени, победитель врагов — подчинил землю своей власти. И доблестью, и добродетелями он правил народом как отец, воплощая идеал покровительственной и благой царской власти.
व्यास उवाच