Bhāgīrathī-tīra-śauca, Kurukṣetra-gamana, and Śatayūpa-āśrama-dīkṣā (गङ्गातीरशौच–कुरुक्षेत्रगमन–शतयूपाश्रमदीक्षा)
भो भो राजजन्न दग्धव्यमेतद् विदुरसंज्ञकम् । कलेवरमिहैवं ते धर्म एब सनातन:,अब दिद्दान् धर्मराजने वहीं विदुरके शरीरका दाह-संस्कार करनेका विचार किया। इतनेहीमें आकाशवाणी हुई--“राजन्! शत्रुसंतापी भरतनन्दन! इस विदुर नामक शरीरका यहाँ दाह-संस्कार करना उचित नहीं है; क्योंकि वे संन्यास-धर्मका पालन करते थे। यहाँ उनका दाह न करना ही तुम्हारे लिये सनातन धर्म है। विदुरजीको सान्तानिक नामक लोकोंकी प्राप्ति होगी; अतः उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये”
vaiśampāyana uvāca | bho bho rājan na dagdhavyam etad vidura-saṃjñakam | kalevaram ihaivaṃ te dharma eṣa sanātanaḥ ||
Вайшампаяна сказал: «О царь, не предавай огню здесь это тело, известное как Видура. Для тебя в этом случае воздержание от сожжения — вечное правило дхармы».
वैशम्पायन उवाच