अध्याय ९५: चित्राङ्गदस्य गन्धर्वेण सह संग्रामः तथा विचित्रवीर्यस्य राज्याभिषेकः
Chitrāṅgada’s duel with the Gandharva and Vicitravīrya’s consecration
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपरव्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयगायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९३ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २०३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ ३ “लोक हैं) नमन () अजआत+- - ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे। चतुर्नवतितमो< ध्याय: पूरुवंशका वर्णन जनमेजय उवाच भगवज्छोतुमिच्छामि पूरोर्वशकरान् नृपान् । यद्वीर्यान् यादृशांश्वापि यावतो यत्पराक्रमान्,जनमेजय बोले--भगवन! अब मैं पूरुके वंशका विस्तार करनेवाले राजाओंका परिचय सुनना चाहता हूँ। उनका बल और पराक्रम कैसा था? वे कैसे और कितने थे?
Janamejaya uvāca: bhagavañ śrotum icchāmi pūror vaṁśa-karān nṛpān | yad-vīryān yādṛśāṁś cāpi yāvato yat-parākramān ||
Джанамеджая сказал: «О почтенный, я желаю услышать о царях, которые расширили род Пуру. Какова была их доблесть и мощь — какими героями они были, сколько их было и какие подвиги отваги они совершили?»
जनमेजय उवाच