ययाति–दौहित्रसंवादः
Yayāti and the Grandsons: Discourse on Lokas, Dāna, and Satya
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहत: शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसूजेत् परेषु,दुष्ट मनुष्योंक मुखसे कटु वचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं। अतः विद्वान पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे
vāksāyakā vadanān niṣpatanti yair āhataḥ śocati rātryahāni | parasya nāmarmasu te patanti tān paṇḍito nāvasūjet pareṣu ||
Шакра сказал: «Из уст человека вылетают стрелы — в образе речи; поражённый ими скорбит день и ночь. Эти словесные стрелы попадают в самые чувствительные, жизненно важные места другого. Потому мудрый не должен метать в людей такие жестокие слова».
शक्र उवाच