Ruru–Pramadvarā: Lineage, Fosterage, Betrothal, and the Snakebite Crisis (Ādi Parva, Adhyāya 8)
रुरुदुः कृपयाविष्टा रुरुस्त्वार्तों बहिर्ययौ । ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठास्तत्रैवोपाविशंस्तदा,वे सब लोग उस कन्याको सर्पके विषसे पीड़ित हो प्राणशून्य हुई देख करुणावश रोने लगे। रुरु तो अत्यन्त आर्त होकर वहाँसे बाहर चला गया और शेष सभी द्विज उस समय वहीं बैठे रहे
Они плакали, охваченные состраданием; Руру же, истерзанный болью, вышел наружу. А все те лучшие брахманы в то время оставались сидеть там.
शौनक उवाच