अध्याय ५७ — राजोपरिचरवसोः धर्मोपदेशः, सत्यवत्याः उत्पत्तिः, व्यासजन्म च
Adhyāya 57: Indra’s Counsel to King Vasu; Origin of Satyavatī; Birth of Vyāsa
ऑपनआक्रात बछ। अर: सप्तपजञ्चाशत्तमो<ध्याय: सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोके नाम शौनक उवाच ये सर्पाः सर्पसत्रेडस्मिन् पतिता हव्यवाहने । तेषां नामानि सर्वेषां श्रोतुमिच्छामि सूतज,शौनकजीने पूछा--सूतनन्दन! इस सर्पसत्रकी धधकती हुई आगमें जो-जो सर्प गिरे थे, उन सबके नाम मैं सुनना चाहता हूँ
Śaunaka uvāca: ye sarpāḥ sarpasatre 'smin patitā havyavāhane | teṣāṁ nāmāni sarveṣāṁ śrotum icchāmi sūtaja ||
Шаунака сказал: «О сын Су́ты, я желаю услышать имена всех тех змей, что пали в это змеиное жертвоприношение и были пожраны пылающим огнём. Скажи мне, кто они были».
शौनक उवाच