सुभद्राहरणम्
Subhadrā-haraṇa: Arjuna’s Taking of Subhadrā and the Dvārakā Assembly’s Response
उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वच: । प्रमाणमस्मि यदि ते मत्त: शृूणु वचोडनघ,अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले--'ऐसा क्यों करते हो?” इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले--“अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो--
vaiśampāyana uvāca | uvāca dīno rājā ca dhanañjayam idaṃ vacaḥ | pramāṇam asmi yadi te mattaḥ śṛṇu vaco 'n-agha ||
Тогда царь, в смятении, сказал Дхананджае (Арджуне): «Безупречный, если ты признаёшь меня авторитетом, выслушай мои слова».
वैशम्पायन उवाच