Gaṅgādvāra-tīrtha, Ulūpī-saṃvāda, and Arjuna’s Dharma-Deliberation (गङ्गाद्वार-तीर्थम्, उलूपी-संवादः)
(वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम् | महेन्द्रश्निन्तितो राजन् विश्वकर्माणमादिशत् ।। फिर जगदीश्वर भगवान् वासुदेवने देवराज इन्द्रका चिन्तन किया। राजन्! उनके चिन्तन करनेपर इन्द्रदेवने (उनके मनकी बात जानकर) विश्वकर्माको इस प्रकार आज्ञा दी। महेन्द्र वाच विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम् | इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति ।। इन्द्र बोले--विश्वकर्मन्! महामते! (आप जाकर खाण्डवप्रस्थ नगरका निर्माण करें।) आजसे वह दिव्य और रमणीय नगर इन्द्रप्रस्थके नामसे विख्यात होगा। वैशग्पायन उवाच महेन्द्रशासनाद् गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम् | प्रणम्य प्रणिपातर्ह कि करोमीत्यभाषत ।। वासुदेवस्तु तच्छुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महेन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माने खाण्डवप्रस्थमें जाकर वन्दनीय भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके कहा-मैेरे लिये क्या आज्ञा है? उनकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा। वायुदेव उवाच कुरुष्व कुरुराजाय महेन्द्रपुरसंनिभम् । इन्द्रेण कृतनामानमिन्द्रप्रस्थं महापुरम् ।।) श्रीकृष्ण बोले--विश्वकर्मन्! तुम कुरुराज युधिष्ठिरके लिये महेन्द्रपुरीके समान एक महानगरका निर्माण करो। इन्द्रके निश्चय किये हुए नामके अनुसार वह इन्द्रप्रस्थ कहलायेगा। ततः पुण्ये शिवे देशो शान्तिं कृत्वा महारथा: । नगरं मापयामासुर्देपायनपुरोगमा:,तत्पश्चात् पवित्र एवं कल्याणमय प्रदेशमें शान्तिकर्म कराके महारथी पाण्डवोंने वेदव्यासजीको अगुआ बनाकर नगर बसानेके लिये जमीनका नाप करवाया
vāyudeva uvāca |
kurūṣva kururājāya mahendrapurasannibham |
indreṇa kṛtanāmānam indraprasthaṁ mahāpuram ||
Ваюдева сказал: «Построй для царя куру (Юдхиштхиры) великий город, подобный небесной столице Махендры. Пусть этот обширный град носит имя, утверждённое Индрой, — Индрапрастха». Затем, в благом и священном краю, великие колесничие совершили умиротворяющие обряды и, поставив во главе Вьясу, велели отмерить землю для основания города.
वायुदेव उवाच