Ādi Parva, Adhyāya 193 — Hastināpura Mantra: Duryodhana’s Proposals to Divide the Pāṇḍavas
डबल >> -अिया दा "3७.ाइ इक: लक लिए ८ - 0७, जप - £ 52 न्त्ज कस कल >4>०>०: श्यैं कर ऋत्कत 7 त्ऋतप कद जी है 20.20:20:84956% 9 //4] ४५१८ न ते तत्र भुक्त्वा पुरुषप्रवीरा यथा55त्मकामं सुभुशं प्रतीता: । उत्क्रम्प सर्वाणि वसूनि राजन् सांग्रामिकं ते विविशुर्नवीरा:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ पाण्डव वहाँ अपनी रुचिके अनुसार उन सब वस्तुओंको खाकर बहुत अधिक प्रसन्न हुए। राजन! (तदनन्तर वहाँ संग्रह की हुई अन्य) सब वैभव-भोगकी सामग्रियोंको छोड़कर वे वीर पहले उसी स्थानपर गये, जहाँ युद्धकी सामग्रियाँ रखी गयी थीं
na te tatra bhuktvā puruṣapravīrā yathātmakāmaṃ subahuṃ pratītāḥ | utkrāmya sarvāṇi vasūni rājan sāṅgrāmikaṃ te viviśur navīrāḥ ||
Насытившись там по своему желанию, эти первейшие из мужей были весьма довольны. Затем, о царь, оставив позади все прочие накопленные богатства и услады, герои направились к месту, где хранились орудия и припасы для войны.
वैशम्पायन उवाच