जतुगृहदाहः — The Burning of the Lac House and the Pāṇḍavas’ Concealed Escape
कर्ण उवाच कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे । डन्ड्ययुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो,कर्णने कहा--प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वद्ध-युद्ध करनेकी इच्छा है
Карна сказал: «Владыка, я считаю, что всё сказанное тобою уже свершилось. Я избираю дружбу с тобой и желаю, о господин, сразиться с Партхой (Арджуной) в поединке».
कर्ण उवाच