अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
ऋषियोंने कहा--उग्रश्रवाजी! परमर्षि श्रीकृष्ण-द्वैधायनने जिस प्राचीन इतिहासरूप पुराणका वर्णन किया है और देवताओं तथा ऋषियोंने अपने-अपने लोकमें श्रवण करके जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है, जो आख्यानोंमें सर्वश्रेष्ठ है, जिसका एक-एक पद, वाक्य एवं पर्व विचित्र शब्दविन्यास और रमणीय अर्थसे परिपूर्ण है, जिसमें आत्मा-परमात्माके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय एवं उनके अनुभवके लिये अनुकूल युक्तियाँ भरी हुई हैं और जो सम्पूर्ण वेदोंके तात्पर्यानुकूल अर्थसे अलंकृत है, उस भारत-इतिहासकी परम पुण्यमयी, ग्रन्थके गुप्त भावोंको स्पष्ट करनेवाली, पदों-वाक्योंकी व्युत्पत्तिसे युक्त, सब शास्त्रोंके अभिप्रायके अनुकूल और उनसे समर्थित जो अदभुतकर्मा व्यासकी संहिता है, उसे हम सुनना चाहते हैं। अवश्य ही वह चारों वेदोंके अर्थोंसे भरी हुई तथा पुण्यस्वरूपा है। पाप और भयका नाश करनेवाली है। भगवान् वेदव्यासकी आज्ञासे राजा जनमेजयके यज्ञमें प्रसिद्ध ऋषि वैशम्पायनने आनन्दमें भरकर भलीभाँति इसका निरूपण किया है ।। १७-- २१ || सौतिर्वाच आट्य॑ पुरुषमीशान पुरुहूतं पुरुष्ठतम् । ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्ते सनातनम्,उग्रश्रवाजीने कहा--जो सबका आदि कारण, अन्तर्यामी और नियन्ता है, यज्ञोंमें जिसका आवाहन और जिसके उद्देश्यसे हवन किया जाता है, जिसकी अनेक पुरुषोंद्वारा अनेक नामोंसे स्तुति की गयी है, जो ऋत (सत्यस्वरूप), एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव एवं एकमात्र अविनाशी और सर्वव्यापी परमात्मा), व्यक्ताव्यक्त (साकार-निराकार)-स्वरूप एवं सनातन है, असत-सत् एवं उभयरूपसे जो स्वयं विराजमान है; फिर भी जिसका वास्तविक स्वरूप सत्-असत् दोनोंसे विलक्षण है, यह विश्व जिससे अभिन्न है, जो सम्पूर्ण परावर (स्थूल- सूक्ष्म) जगत्का स्रष्टा, पुराणपुरुष, सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर एवं वृद्धि-क्षय आदि विकारोंसे रहित है, जिसे पाप कभी छू नहीं सकता, जो सहज शुद्ध है, वह ब्रह्म ही मंगलकारी एवं मंगलमय विष्णु है। उन्हीं चराचरगुरु हृषीकेश (मन-इन्द्रियोंके प्रेरक) श्रीहरिको नमस्कार करके सर्वलोकपूजित अद्भुतकर्मा महात्मा महर्षि व्यासदेवके इस अन्तःकरणशोधक मतका मैं वर्णन करूँगा
sautir uvāca |
ādyaṃ puruṣam īśānaṃ puruhūtaṃ puruṣṭamam |
ṛtam ekākṣaraṃ brahma vyaktāvyakte sanātanam ||
Соути сказал: Я поведаю о благом Вишну—Хари, Хришикеше—о первозданном Пуруше, внутреннем Владыке и Верховном Господе; о том, кого призывают в жертвоприношениях и ради кого возливают приношения. Многие восхваляют Его многими именами; Он — сама Истина, нетленный односложный Брахман (пранава), вечный, пребывающий и в явленном, и в неявленном. Хотя Он кажется бытием и небытием, или обоими, Его подлинная природа превосходит оба. Вселенная не отделена от Него; Он — творец всех высших и низших миров, древний Пуруша, высочайший Бог, не затронутый ростом и упадком и не оскверняемый грехом—чистый по самой своей сущности. Поклонившись этому учителю всего движущегося и неподвижного, почитаемому во всех мирах, я изложу очищающее сердце учение, заключённое в дивном творении великого риши Вьясы.
The verse frames the Mahābhārata as grounded in a supreme, all-pervading reality: the primal Lord who is both manifest and unmanifest, identical with cosmic truth (ṛta) and the imperishable Brahman (ekākṣara). It establishes a devotional and metaphysical foundation—purity, transcendence beyond being/non-being, and the idea that the universe is not separate from the divine source.
At the opening of the epic’s recitation, Sauti begins with a mangala (auspicious) invocation. He salutes the supreme deity (identified in the surrounding prose as Vishnu/Hari/Hṛṣīkeśa) and announces his intention to narrate Vyāsa’s heart-purifying composition, thereby setting the sacred tone for the Mahābhārata’s telling.