यह सोपान ‘अहंकार-निवृत्ति’ और ‘धर्म-युद्ध में ईश्वर-आश्रय’ का द्वार है। लंका काण्ड में साधक के भीतर की ‘लंका’ (काम-क्रोध-मद) पर धावा होता है: पहले कोलाहल, फिर अंधकार (माया), और अंततः राम-बाण-रूप प्रकाश (ज्ञान/कृपा) से संशय-तम का नाश। यह चरण बताता है कि बल/पराक्रम भी तभी मंगल है जब वह राम-नाम/राम-कृपा से संयुक्त हो; अन्यथा रावण का अभिमान टिट्टिभ-उदात्तान (असमर्थ दंभ) बनकर विनाश को बुलाता है।
यह प्रकरण ‘अंतर-लंका’ पर धावे का रूपक है: (1) कोलाहल = इंद्रिय-वेगों का उन्माद, (2) दुर्ग/प्राचीर = अहंकार की किलेबंदी, (3) मेघनाद का प्रतिरोध = माया-जनित भ्रम और छल-बल, (4) माया-तम = संशय, मोह, आत्म-विस्मृति, (5) राम का अग्नि-सायक/प्रकाश = ज्ञान-कृपा जो तम को काटती है। केंद्रीय प्रतीक-वाक्य: पराक्रम तभी मंगल है जब वह ‘राम-प्रताप’ से संयुक्त हो; अन्यथा रावण का बल ‘असमर्थ दंभ’ बनकर स्वयं-विनाश को बुलाता है। धर्म-युद्ध का संदेश बाह्य रण से आगे बढ़कर साधक के भीतर ‘अहंकार-निवृत्ति’ और ‘ईश्वर-आश्रय’ की साधना बन जाता है।
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