भद्रवटगमनम् — स्कन्देन महिषदानवनिग्रहः
Bhadravaṭa Procession and Skanda’s Neutralization of Mahiṣa
#::73:.8 #::3:.:7 () हि २ 7 ३. “अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है। यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह “वीर” नामक अनि ही है। २. ये वाक्के अभिमानी देवता हैं। “तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्व' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। विशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: पाञज्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच काश्यपो हाथ वासिष्ठ: प्राणश्न॒ प्राणपुत्रक: । अग्निराड्धिरसश्वैव च्यवनस्त्रिषु वर्चक:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र काश्यप, वसिष्ठ-पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अंगिराके पुत्र च्यवन तथा त्रिवर्चा-ये पाँच अग्नि हैं
mārkaṇḍeya uvāca |
kāśyapo hāṭha-vāsiṣṭhaḥ prāṇaś ca prāṇa-putrakaḥ |
agnir āṅgirasaś caiva cyavanas triṣu-varcakaḥ ||
Disse Mārkaṇḍeya: “Ó Yudhiṣṭhira, estes são os cinco fogos sagrados: Kāśyapa (filho de Kaśyapa), Hāṭha-Vāsiṣṭha (filho de Vasiṣṭha), Prāṇa (e Prāṇaputraka), Agni da linhagem dos Āṅgirasa, e Cyavana, o de tríplice fulgor. Assim se descrevem a origem e a linhagem dos fogos Pañcajana.”
मार्कण्डेय उवाच