न हि बाणा मयोत्सृष्टा: सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्य॑ पुरा क्षत्रियसंगरे,मेरे चलाये हुए बाण देहधारियोंके शरीरमें अटकते नहीं हैं। (उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।) यह बात तुम्हें पूर्वकालमें क्षत्रियोंक साथ होनेवाले युद्धके समय ज्ञात हो चुकी है
“As flechas que eu lanço não ficam presas nos corpos dos seres: elas os rasgam e os atravessam. Isso te é conhecido desde outrora, nos combates dos kṣatriyas.”
राम उवाच